Friday, April 19, 2019

Führende Scientologen gehören zu den aktivsten Immobilienplayern der Stadt

Ein Firmengeflecht rund um die Swiss Immo Trust AG in Kaiseraugst war massgeblich an der Finanzierung der Scientology-Zentrale am Rande Basels beteiligt. Recherchen der TagesWoche zeigten, wie führende Personen in diesen Firmen mit ihren namhaften Spenden einen Grossteil des Sektentempels an der Burgfelderstrasse finanzierten.

Doch nicht nur innerhalb des Basler Ablegers von Scientology ist dieses Unternehmen eine relevante Grösse. Wie unsere Datenauswertung zeigt, gehört die Swiss Immo Trust zu den wichtigsten Akteuren im Geschäft der Umwandlung von Mietwohnungen in Stockwerkeigentum.

Die TagesWoche hat die im Kantonsblatt publizierten Handänderungen auf dem Basler Immobilienmarkt seit Mitte 2008 ausgewertet. Eine solche Transaktion beschreibt den Verkauf einer Immobilie. Naturgemäss geschieht dies bei der Umwandlung in Stockwerkeigentum in relativ kurzer Zeit gleich mehrfach. Ein Unternehmen kauft eine Liegenschaft auf, renoviert oder baut neu und bringt die Wohnungen daraufhin einzeln auf den Markt. Statt einem einzelnen Eigentümer gibt es nun viele verschiedene.

Umstrittenes Business
Dieses Business gilt deshalb als umstritten, weil dadurch sehr oft günstiger Wohnraum verloren geht. Bevor die Umwandlung in Wohneigentum möglich ist, müssen die bisherigen Mieter nämlich weichen.

Zwischen 2010 und 2014 war die Swiss Immo Trust an über 50 solcher Handänderungen beteiligt. Bei 43 davon ging es um Stockwerkeigentum, verteilt auf insgesamt fünf Bauprojekte. Die Liegenschaften befinden sich allesamt im Gebiet zwischen Schützenmatt- und Kannenfeldpark. Bei all diesen Projekten immer mit dabei: Rudolf Flösser, leitender Direktor von Scientology Basel.

Grösstes Projekt war die Überbauung zwischen der Türkheimerstrasse und dem Spalenring. Dort kaufte die Swiss Immo Trust zwei ältere Liegenschaften auf, um sie durch einen Neubau mit 21 Eigentumswohnungen zu ersetzen.

Das Projekt an der Türkheimerstrasse wurde von der
BW-Liegenschaftsverwaltung geleitet, die sich ebenfalls in den Händen einer Scientologin befindet.

Dies Leitung dieses Projekts oblag der BW-Liegenschaftsverwaltung GmbH, einer Firma von Brigitte Widmer – Scientologin und potente Spenderin für den Bau der Sektenzentrale. Die Wohnungen waren zuvor sehr günstig, eine 3-Zimmer-Wohnung kostete weniger als 1000 Franken.

Das Geschäft ging nicht reibungslos über die Bühne, weil sich einige der verbliebenen Mieter gegen ihre Kündigungen wehrten. Darunter zwei Gewerbler, eine Druckerei und ein Malergeschäft. Diese suchten Hilfe beim Mieterverband und erhoben Einsprache.

Eine erste Kündigung, ausgesprochen durch die Firma BW-Immobilientreuhand, ebenfalls aus dem Umkreis der Scientology, erfolgte zur Unzeit und wurde deshalb für ungültig erklärt. Das Bauprojekt in seiner ersten Version (hauptsächlich 1- und 2-Zimmer-Wohnungen) hielt der gerichtlichen Prüfung ebenso wenig stand und wurde für untauglich befunden. Die Mieter durften ein Jahr länger bleiben.

Nachträgliche Kosten
Unangenehm aufgefallen ist die Swiss Immo Trust auch auf dem Land. 2008 berichtete etwa der «Blick» von einer Überbauung in Therwil. Dort wurde sämtlichen 28 Mietparteien wegen Sanierungsbedarf gekündigt – ihre Wohnungen wurden danach während der Euro 08 aber für mehr als 400 Franken pro Tag an Fussballfans zwischenvermietet.

In einem anderen Fall in Oberwil kam es zwischen dem Unternehmen und
26 Käuferparteien von Eigentumswohnungen zu einem Streit wegen einer Rechnung von 600’000 Franken. Die Swiss Immo Trust wollte diese Anschlussgebühr für Wasser und Kanalisation nachträglich auf die Käufer überwälzen.

Diese gingen jedoch davon aus, dass diese Gebühren bereits im Kaufpreis enthalten gewesen waren. Erst nachdem wiederum die BaZ recherchiert hatte, zeigte sich die Swiss Immo Trust einsichtig und verzichtete auf die Forderung.

Monday, April 15, 2019

#AzamKhan के बयान पर बवाल, अखिलेश की चुप्पी पर सवाल: लोकसभा चुनाव 2019

समाजवादी पार्टी के नेता आज़म ख़ान के रविवार को रामपुर में एक चुनावी सभा के दौरान कथित तौर पर जया प्रदा के बारे में की गई एक टिप्पणी को लेकर विवाद हो गया है.

ख़ान ने कहा है, "रामपुरवासियों को जिन्हें समझने में 17 साल लगे, उन्हें मैंने 17 दिन में ही पहचान लिया था कि उनकी अंडरवियर का रंग ख़ाकी है."

आज़म ख़ान के इस बयान का राष्ट्रीय महिला आयोग और सुषमा स्वराज समेत देश की तमाम वरिष्ठ महिला नेताओं ने विरोध किया है.

राष्ट्रीय महिला आयोग की प्रमुख रेखा शर्मा ने आज़म ख़ान को नोटिस जारी करते हुए इस मामले पर स्पष्टीकरण मांगा है.

जया प्रदा ने इस मामले पर टिप्पणी देते हुए कहा है कि आज़म ख़ान की उम्मीदवारी रद्द होनी चाहिए क्योंकि अगर वह चुनाव जीत जाते हैं तो इससे समाज में महिलाओं की स्थिति ख़राब होगी.

इसके साथ ही सोशल मीडिया पर भी राजनेताओं से लेकर आम लोग आज़म ख़ान के बयान पर अखिलेश यादव की चुप्पी पर सवाल उठा रहे हैं.

वहीं, इस सबके बीच समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने इस मुद्दे पर किसी तरह का बयान देने की जगह आज़म ख़ान के साथ हाथ मिलाते हुए ट्विटर पर तस्वीरें साझा की हैं.

जया प्रदा ने इस मामले पर अपनी बात रखते हुए कहा है, "उनके लिए ये कोई नई बात नहीं है. 2009 में मैं उन्हीं की पार्टी में प्रत्याशी थी. पार्टी में होते हुए भी अखिलेश ने मेरा समर्थन नहीं किया था जब मेरे ऊपर इस तरह की टिप्पणी हुई थी. आज़म ख़ान साहब को आदत है. वो आदत से मजबूर हैं. अगर वो ऐसी टिप्पणी नहीं करते हैं तो वो एक नई बात होगी."

"लेकिन बात ये है कि इनका स्तर कितना गिर गया है. वह लोकतंत्र और संविधान की धज्जियां उड़ा रहे हैं. मैं एक महिला हूं और जो टिप्पणी मेरे ऊपर की गई है, उसे मैं अपने मुंह से बोल भी नहीं सकती हूं. इस बार इन्होंने हद पार कर दी है. मेरी क्षमता ख़त्म हो गई है. अब मेरे लिए वो भाई नहीं है और कुछ भी नहीं हैं. मैंने ऐसी कौन सी बात कर दी है कि वो इस तरह की टिप्पणी कर रहे हैं. लेकिन उसके ऊपर एफ़आईआर भी हुई है जिसका मतलब ये है कि ये मामला जनता तक पहुंचा है. मैं चाहती हूं कि चुनाव से इसकी उम्मीदवारी रद्द करनी चाहिए. क्योंकि अगर ये व्यक्ति चुनाव जीत गया तो समाज में महिलाओं को स्थान भी नहीं मिलेगा."

चुप क्यों हैं अखिलेश?
आज़म ख़ान की इस टिप्पणी के बाद विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने ट्वीट करके लिखा है, "मुलायम भाई - आप पितामह हैं समाजवादी पार्टी के. आपके सामने रामपुर में द्रौपदी का चीर हरण हो रहा हैं. आप भीष्म की तरह मौन साधने की ग़लती मत करिये."

सोशल मीडिया से लेकर टीवी स्क्रीन पर छाए इस विवाद के दौरान अखिलेश यादव ने अपनी रामपुर रैली की तस्वीरें ट्विटर पर साझा की हैं.

सोशल मीडिया यूज़र्स ने इन्हीं तस्वीरों को जारी करने पर अखिलेश यादव को आड़े हाथों लिया है.

लेखिका अद्वैता काला लिखती हैं, "अखिलेश यादव ने आज़म ख़ान की महिलाओं के ख़िलाफ़ टिप्पणी पर अपनी प्रतिक्रिया दी है. उन्होंने गर्व के साथ अपनी उपस्थिति को ज़ाहिर किया है जब ये बयान दोबारा दोहराया न जा सकने वाला बयान दिया गया है. अब राष्ट्रीय महिला आयोग और चुनाव आयोग से उम्मीद है. नेतृत्व से कोई उम्मीद नहीं है."

कौस्तुभ मिश्रा नाम के ट्विटर यूज़र लिखते हैं, "शर्म आनी चाहिए आपको अब तक आपने माफ़ी तक नहीं मांगी और कैसे बेशर्मी से आप ट्वीट कर रहे हो. ये है सपा बसपा जैसे छोटे दलों की लालची सोच".

सोशल मीडिया पर कई कांग्रेस समर्थक ट्विटर यूज़र्स ने भी अखिलेश को आड़े हाथों लिया है.

एक ऐसे ही ट्विटर यूज़र विवेक सिंह कहते हैं, "भइया जी, थोड़ा समझाओ, आज़म ख़ान जी को. दिमाग़ ठिकाने रखकर बोला करें. मुझे नहीं लगता कि रामपुर या देश को आज़म ख़ान की ज़रूरत है. हम सभी औरत की कोख से जन्मे हैं...ये हमें भूलना नहीं चाहिए. जया प्रदा विरोधी हो सकती हैं लेकिन वह भी एक नारी हैं."

वहीं, ट्विटर यूज़र माया मिश्रा लिखती हैं, "अपनी माँ बहन के साथ भी यही भाषा का प्रयोग करते हैं, आज़म खान को इतनी इज़्ज़त दे रहे है @yadavakhilesh"

हालांकि, आजम ख़ान ने ये बयान देने से इनकार किया है.

समाजवादी पार्टी के प्रवक्ता घनश्याम तिवारी ने बीबीसी को बताया है, "हमारी पार्टी चाहती थी कि इस मुद्दे पर आज़म ख़ान अपना बयान दें और उन्होंने अपना बयान दे दिया है. ऐसे में फ़िलहाल हमारे लिए ये मुद्दा ख़त्म हो चुका है. आने वाले दिनों में जब हमारे राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव प्रेस कॉन्फ्रेंस करेंगे तब पत्रकार बंधू उनसे सवाल कर सकते हैं कि उनका व्यक्तिगत रूप से इस बारे में क्या सोचना है."

जब समाजवादी पार्टी के प्रवक्ता घनश्याम तिवारी से आज़म ख़ान की उम्मीदवारी काटे जाने की मांग को लेकर सवाल किया गया तो उन्होंने कहा कि पार्टी ऐसी किसी मांग को स्वीकार करने नहीं जा रही है.

Monday, April 8, 2019

राहुल गांधी ने कहा शिक्षा ऋण पर ब्याज माफ़ करेगी कांग्रेस: प्रेस रिव्यू

कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने कहा है कि अगर उनकी पार्टी सत्ता में आती है तो वो पुराने शिक्षा ऋण पर बकाया ब्याज को माफ़ कर देगी. ये ब्याज़ माफ़ी 31 मार्च 2019 तक के ऋणों पर की जाएगी.

उन्होंने ये भी वादा किया कि जब तक किसी विद्यार्थी को नौकरी नहीं मिल जाती या स्वरोज़गार के ज़रिए कमाई नहीं होती, तब तक बैंक कोई ब्याज नहीं ले सकेगा.

राहुल गांधी ने रविवार को फेसबुक पोस्ट के माध्यम से ये भी कहा कि पार्टी ने शिक्षा ऋण के लिए एकल खिड़की सिस्टम का भी वादा किया है. इससे युवाओं को ऋण लेने में आसानी होगी.

वर्तमान व्यवस्था के मुताबिक़ शिक्षा ऋण पर युवाओं को नौकरी लगने तक सिर्फ़ ब्याज देना होता है. नौकरी या स्वरोज़गार शुरू होने के बाद ऋण की क़िस्त शुरू होती है.

इंडियन एक्सप्रेस में ख़बर है कि एनसीईआरटी ने 10वीं कक्षा की इतिहास की किताब से तीन अध्याय हटा दिए हैं. हटाए गए अध्यायों में से एक भारत-चीन क्षेत्र में राष्ट्रवाद के उदय पर है.

दूसरा अध्याय उपन्यास के ज़रिए समकालीन विश्व के इतिहास के विवरण और तीसरा विश्व भर में शहरों के विकास पर है.

यह फ़ैसला विद्यार्थियों पर स्लेबस का बोझ कम करने को लेकर किया गया है. मानव संसाधन मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने इसकी घोषणा की थी.

10वीं कक्षा कि किताब 'भारत और समकालीन विश्व' में पहले 200 पन्ने थे जिसमें से अब 77 पन्ने कम हो जाएंगे.

ये दूसरी दफ़ा है जब सरकार ने समीक्षा के बाद किसी किताब के अध्याय कम किए हैं. बदली हुई किताब नए सत्र से लागू होगी.

हिंदुस्तान टाइम्स की ख़बर के अनुसार 11 अप्रैल को मतदान के पहले चरण से तीन दिन पहले बीजेपी और कांग्रेस ने अपने-अपने नारों की घोषणा कर दी है.

बीजेपी ने पिछली बार नारा दिया था कि 'अबकी बार मोदी सरकार' लेकिन इस बार नारे में थोड़ा बदलाव किया गया है. इस बार का नारा है, 'फिर एक बार, मोदी सरकार'.

इसे नारे की घोषणा वित्त मंत्री अरुण जेटली ने एक प्रेस कांफ्रेस करके की. उनके साथ प्रेस कांफ्रेस में कैबिनेट मंत्री पीयूश गोयल और बीजेपी महासचिव भूपेंद्र यादव भी मौजूद थे.

वहीं, कांग्रेस ने इस बार 'न्याय' थीम पर अपना नारा बनाया है. कांग्रेस ने इससे जुड़ा एक वीडियो भी जारी किया है और नारा दिया है, 'अब होगा न्याय'.

कांग्रेस प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला ने एक प्रेस कांफ्रेस में ये नारा लॉन्च किया. उनके साथ कांग्रेस नेता आनंद शर्मा और पवन खेड़ा भी मौजूद थे.

इंडियन एक्सप्रेस की ख़बर के मुताबिक़ जम्मू-कश्मीर में बारामूला-उधमपुर नेशनल हाइवे पर सप्ताह में दो दिन आवाजाही को लेकर विवाद बढ़ता जा रहा है. राजीतिक दल लगातार इस फ़ैसले का विरोध कर रहे हैं.

नेशनल कांफ्रेंस के अध्यक्ष फ़ारूक़ अब्दुल्लाह ने प्रतिबंध को तत्काल वापस लेने की मांग की है. वहीं, पीडीपी प्रमुख महबूबा मुफ़्ती ने घाटी के लोगों को दबाने का आरोप लगाया और कहा कि वह सरकार के इस आदेश को कोर्ट में चुनौति देंगी.

सरकार ने श्रीनगर-जम्मू नेशनल हाइवे पर 31 मई तक सप्ताह में दो दिनों के लिए आम लोगों की आवाजाही पर रोक लगाने का फ़ैसला किया है. राज्य के गृह सचिव की ओर से बुधवार को ये आदेश जारी किया गया है.

14 फ़रवरी को पुलवामा में हुए हमले के बाद भारत के गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने कहा था कि जिस दौरान सुरक्षा बलों के क़ाफ़िले गुज़रेंगे, उस समय आम नागरिकों के वाहनों को चलने की इजाज़त नहीं होगी. कहा जा रहा है कि सुरक्षा को ध्यान में रख कर ये फ़ैसला लिया गया है.

Thursday, April 4, 2019

तालिबान से बातचीत शांति लाएगी या अफ़ग़ानिस्तान के हालात और बिगड़ेंगे?

18 साल में पहली बार ऐसा हुआ है जब अमरीकी सरकार अफ़ग़ानिस्तान से अपनी सेना को वापस बुलाने को लेकर संजीदा नज़र आ रही है. यह पहला मौक़ा है जब अमरीकी सरकार अपने इतिहास के इस सबसे लंबे चले युद्ध को समाप्त करने को लेकर गंभीर दिख रही है.

बीते साल अक्टूबर से लेकर अभी तक अमरीकी अधिकारियों और तालिबानी प्रतिनिधियों के बीच पांच बार सीधे-सीधे तौर पर बातचीत हो चुकी है और उम्मीद है कि जल्दी ही छठी बार भी दोनों पक्ष आमने-सामने होंगे.

पांच बार हो चुकी इस बातचीत का मक़सद यह रहा कि अमरीकी सेना अफ़ग़ानिस्तान से सुरक्षित और शांति से निकल जाएगी लेकिन बदले में विद्रोहियों को गारंटी देनी होगी अफ़ग़ानिस्तान की ज़मीन का इस्तेमाल बाहरी विद्रोहियों द्वारा नहीं किया जाएगा और न ही यह दुनिया के बाक़ी हिस्सों के लिए ख़तरा बनेगा.

तालिबान द्वारा अल-क़ायदा को शरण देने के कारण अमरीकी नेतृत्व वाले गठबंधन ने साल 2001 में तालिबान को उखाड़ फेंका. वॉशिंगटन में हुए 9/11 हमलों के लिए चरमपंथी संगठन अल कायदा को ही ज़िम्मेदार ठहराया जाता रहा है.

अफ़ग़ानिस्तान में संघर्ष विराम और शांति बहाली इतनी आसान नहीं. शांति बहाली को लेकर यहां सहमति एक बड़ा मुद्दा है.

लेकिन क़तर की राजधानी दोहा में हुई अमरीका और तालिबान के बीच की बातचीत इस मक़सद को पाने के लिए उठाया गया महज़ पहला क़दम भर है, जिसका नतीजा क्या आएगा ये भी सुनिश्चित नहीं है. इस मक़सद को पाने के रास्ते में अभी कई जोख़िम और मुश्किलें हैं.

पूरे देश में अभी भी लगातार युद्ध जारी है. भले ही तालिबान बातचीत कर रहा है लेकिन एक बात समझना ज़रूरी है कि साल 2001 की तुलना में एक बड़ा हिस्सा उसके नियंत्रण में है और वहां उसका प्रभाव भी बढ़ा है.

विद्रोहियों के साथ लगातार बने हुए गतिरोध को देखते हुए, अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप अब युद्ध विराम के इच्छुक नज़र आते हैं. अमरीकी अधिकारियों के मुताबिक़ इसकी एक बड़ी वजह ये भी है कि इसके लिए अमरीका सालाना 45 अरब पाउंड ख़र्च करता है.

अभी हाल ही में अमरीका की ओर से संकेत दिया गया कि वो अपने क़रीब 14 हज़ार सैनिकों को आने वाले समय में वापस बुला लेगा. इस बात ने हर किसी को सकते में डाल दिया और इस बात से तालिबान भी अचरज में आ गया.

नेटो मिशन के तहत अफ़ग़ान सिक्योरिटी फोर्सेज़ को ट्रेनिंग देने के लिए अफ़ग़ानिस्तान में क़रीब हज़ार ब्रिटिश सैनिक भी मौजूद हैं.

लेकिन भले ही अमरीका और तालिबान अपने प्रमुख मुद्दों को सुलझा भी लें लेकिन अफ़ग़ान के पास कई ऐसे अंदरूनी मसले तब भी बचे रहेंगे जिन्हें उन्हें सुलझाना होगा- जिनमें युद्धविराम एक प्रमुख मुद्दा होगा. इसके अलावा उसे ऐसी स्थिति भी बनानी होगी जिसके तहत सरकार और तालिबान के बीच संवाद भी बना रहे और सबसे ज़रूरी उन्हें अपने यहां एक नए सिरे से एक नई सरकार का गठन करना होगा और पूरी तरह से एक राजनीतिक ढांचे को आकार देना होगा.

अगर सबकुछ बेहतर रहा तो युद्धविराम के बाद इस साल के अंत तक नए सिरे से चुनाव होंगे और तालिबान भी उसमें हिस्सा लेगा लेकिन बाद में ऐसा होगा या नहीं ये कह पाना मुश्किल लगता है.

जब तक पूरी तरह युद्धविराम नहीं हो जाता या कुछ हद तक ही यह नहीं हो जाता तब तक चुनावों में गड़बड़ी की पूरी आशंका है. राजनीतिक उथल-पुथल की आशंका रहेगी और इसकी वजह से शांति प्रक्रिया कमज़ोर हो सकती है. राजनीतिक अस्थिरता बढ़ सकती है.

तो क्या सत्ता का बंटवारा किया जा सकता है और अगर हां तो कैसे?

अगर इस संदर्भ में बात करें तो बहुत सारी परिस्थितियां हैं और बहुत सारे विकल्प भी.

सबसे पहले तो जो भी वरिष्ठ और फ़ैसला लेने में सक्षम लोग हैं उन्हें राष्ट्रपति चुनाव को लेकर तय करने की ज़रूरत है कि चुनाव सुनियोजित तरीक़े से हों. हालांकि ये चुनाव की तारीख़ें पहले से ही आगे बढ़ा दी गई हैं. पहले ये चुनाव सितंबर के अंत में होने थे लेकिन अब तारीख़ें आगे बढ़ा दी गई हैं.

अगर चुनावों से पहले कोई शांति समझौता नहीं होता है तो काबुल में एक नई सरकार तालिबान के साथ शर्तों को लेकर बातचीत कर सकती है.

लेकिन चुनावों को और भी आगे बढ़ाया जा सकता था या फिर वर्तमान सरकार का कार्यकाल बढ़ाया जा सकता था जबकि एक नई सरकार के लिए पारस्परिक सहमति ज़रूरी है. इसमें तालिबान की स्वीकृति भी अहम है.

तो क्या तालिबान का सरकार में शामिल होना विकल्प है?

एक अस्थायी तटस्थ सरकार या गठबंधन बनाना, जिसमें तालिबान भी शामिल हो- ऐसी परिस्थिति में यह एक और विकल्प हो सकता है.

अमरीकी सैनिकों के चले जाने के बाद विधानसभा को अंतरिम सरकार चुनने के लिए बुलाया जा सकता है.

इसके अलावा एक सुझाव यह भी है कि इसके लिए अफ़गान सैनिकों, प्रमुख ताक़तों और पड़ोसी राज्यों को शामिल किया जाए लेकिन तालिबान की भागीदारी के साथ.

तालिबान के कई नेताओं ने मुझे बताया कि उन्हें मुख्य धारा में आने के लिए और चुनावों की तैयारी के लिए वक़्त चाहिए.

क्या पुराने दुश्मन साथ काम कर पाएंगे ?

इस युद्ध ने किसी एक को नुक़सान नहीं पहुंचाया है. हर तरफ़ से सिर्फ़ नुक़सान ही हुआ और हर पक्ष का हुआ है. वो चाहे सरकारी और सत्ता पक्ष का हो, विद्रोहियों की तरफ़ का हो या फिर नागरिकों के लिहाज़ से, ऐसे में आपसी गतिरोध और संघर्ष को बुलाकर आगे बढ़ना एक चुनौती है.

उदाहरण के लिए, तालिबान मौजूदा संविधान को स्वीकार नहीं करता है और अफगान सरकार को "अमरीकी कठपुतली" के तौर पर देखता है.

अब तक राष्ट्रपति अशरफ़ गनी की सरकार विद्रोहियों के साथ सीधे तौर पर बातचीत में शामिल नहीं हुई है. उनका कहना है कि उनके लिए जिस सरकार का कोई अस्तित्व नहीं है वे उससे बात क्यों करें. जिसे वे पहचानते नहीं, उनसे बात क्यों करें.