Sunday, November 4, 2018

रामचंद्र गुहा प्रकरण पर ब्लॉग: पढ़ने-लिखने से ज़्यादा ज़रूरी 'हिंदूवादी देशभक्ति' है

देशद्रोहियों' की लंबी होती सूची में एक और नाम जुड़ गया है इतिहासकार रामचंद्र गुहा का. गुहा अहमदाबाद यूनिवर्सिटी में प्रोफ़ेसर नहीं होंगे क्योंकि अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) की नज़रों में वे 'शिक्षा और देश के लिए नुकसानदेह हैं.

रामचंद्र गुहा के बारे में बात करने से पहले ज़रा पीछे चलें तो इस ट्रेंड को समझने में आसानी होगी.

27 सितंबर 2018- मध्य प्रदेश में मंदसौर के एक सरकारी कॉलेज के एक प्रोफ़ेसर ने क्लासरूम में नारेबाज़ी कर रहे अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) के छात्रों से पैर छूकर माफ़ी मांगी थी.

यह वीडियो एक दिन के लिए वायरल हुआ उसके बाद लोग उसे भूल गए, 'देशद्रोही' घोषित किए गए प्रोफ़ेसर साहब ने गांधीवादी तरीक़े से अपना विरोध प्रकट किया था, और समझदारी भी इसी में थी.

उसी राज्य में उज्जैन में 2006 में माधव कॉलेज के प्रोफ़ेसर सभरवाल की पीट-पीटकर हत्या कर दी गई थी, उन्हें पीटने का आरोप जिन छह लोगों पर लगा था वे भी एबीवीपी के 'देशभक्त छात्र नेता' थे.

प्रोफ़ेसर सभरवाल हत्याकांड के एक प्रमुख अभियुक्त की तबीयत का हाल पूछने मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान 2008 में अस्पताल गए थे जब हत्या के मुक़दमे की सुनवाई जारी थी. ज़ाहिर है, आलोचना हुई कि मुख्यमंत्री हिंसक प्रवृति वाले लोगों का हौसला बढ़ा रहे हैं. लेकिन यह बात भी आई-गई हो गई.

राज्य सरकार ने प्रोफ़ेसर सभरवाल की हत्या के मामले में जो रवैया अपनाया उस पर कुछ लोगों ने सवाल उठाया. बहरहाल, 2009 में सभी छह अभियुक्त 'सबूतों के अभाव में' बरी हो गए, इन सभी का संबंध राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के छात्र संगठन एबीवीपी और संघ परिवार की बजरंग दल जैसी संस्थाओं से था. बरी होने के बाद कुछ लोगों को शिक्षण संस्थानों में नौकरियां भी दी गईं.

कैम्पस है नियंत्रण की पहली सीढ़ी
बीजेपी शासित राज्य मध्य प्रदेश से 10-12 साल पहले एक तरह का ट्रेंड शुरू हुआ. मंदसौर और उज्जैन जैसी कई घटनाएं वहां हुईं, लेकिन 2014 में केंद्र में बीजेपी की सरकार के आने के बाद, एबीवीपी से जुड़े छात्रों ने देश भर के कैम्पसों में ख़ुद को 'देशभक्त' और बाक़ी सभी को 'देशद्रोही' घोषित करने का अभियान छेड़ दिया.

दिल्ली के रामजस कॉलेज और जेएनयू से लेकर, इलाहाबाद और हैदराबाद तक सभी घटनाएं एक जैसी हैं और उन्हें अलग-अलग वाकयों की तरह नहीं बल्कि एक ट्रेंड की तरह देखा और समझा जाना चाहिए.

आरएसएस के निर्देशों के तहत, एबीवीपी या दूसरे हिंदुत्ववादी संगठन जो कुछ कर रहे हैं उसके पीछे सरकार पूरी ताक़त के साथ खड़ी है.

शिक्षण संस्थानों का हिंदूकरण देश के सभी संस्थानों पर आरएसएस के नियंत्रण की पहली सीढ़ी है और इस प्रोजेक्ट पर काफ़ी गंभीरता से काम जारी है. पूरी कोशिश है कि किसी भी कैम्पस में हिंदुत्व के अलावा, किसी और तरह की आवाज़ न सुनाई दे. मसलन, दो साल पहले वरिष्ठ पत्रकार सिद्धार्थ वरदराजन को इलाहाबाद यूनिवर्सिटी से पुलिस के घेरे में वापस लौटना पड़ा क्योंकि एबीवीपी उन्हें 'देशद्रोही' घोषित कर चुकी थी.

छोटे-बड़े हर तरह के 'देशद्रोही'
'गांधी बिफ़ोर इंडिया' और 'इंडिया आफ़्टर गांधी' जैसी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चित किताबें लिखने वाले इतिहासकार रामचंद्र गुहा, गांधी के राज्य गुजरात में 'राष्ट्रविरोधी' घोषित कर दिए गए हैं. एबीवीपी के छात्रों ने तय किया कि अहमदाबाद यूनिवर्सिटी में उनका पढ़ाना 'शिक्षा और राष्ट्र दोनों के लिए' नुकसानदेह होगा.

आम तौर पर देशद्रोही का लेबल चिपका देना ही काफ़ी होता है, लेकिन इस मामले में यूनिवर्सिटी प्रशासन को एक लंबी चिट्ठी लिखी गई जिसमें साबित करने की कोशिश की गई कि रामचंद्र गुहा सचमुच राष्ट्रविरोधी हैं. उस चिट्ठी में गुहा की किताबों के अंशों का हवाला दिया गया, यह तार्किक तरीक़े से अपनी बात रखने की शायद एबीवीपी की पहली कोशिश थी.

लेकिन काश वे जानते कि लिखित शब्दों के साथ " " का क्या मतलब होता है. गुहा के ख़िलाफ़ जो चार सबूत पेश किए गए हैं, उनमें से दो उन्होंने नहीं लिखे हैं बल्कि वे ब्राह्मणवाद विरोधी आंदोलन के नेता ईवी रामास्वामी 'पेरियार' के लेखन और भाषण के अंश हैं जिनका गुहा ने अपनी किताब में " " के साथ हवाला दिया है.

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