Monday, March 11, 2019

जदयू के उम्रदराज़ और युवा वर्ग के बीच की लड़ाई है ये: प्रशांत किशोर

राजनीतिक रणनीतिकार और जदयू के उपाध्यक्ष प्रशांत किशोर के एक बयान ने इन दिनों बिहार के राजनीतिक हलके में चर्चाओं का बाज़ार गर्म कर दिया है.

किशोर ने एक वेब पोर्टल को दिए साक्षात्कार में कहा था, "जुलाई 2017 में राजद से महागठबंधन टूटने के बाद नीतीश कुमार को एनडीए में शामिल होकर सरकार बनाने के बजाय आदर्श रूप में एक नया जनादेश हासिल करके सरकार बनानी चाहिए थी."

इसके पहले भी मुज़फ्फरपुर के एक कार्यक्रम में दिया गया प्रशांत किशोर का बयान सुर्खियों में आया था, जब उन्होंने भरी सभा में यह कह दिया था कि 'जब वह प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री बनाने में मदद कर सकते हैं तो युवाओं को एमएलए-एमपी क्यों नहीं बना सकते."

प्रशांत के दोनों बयान विवाद में रहे हैं. उन्हीं की पार्टी के नेताओं ने उनके बयान की आलोचना की है.

कुछ नेताओं ने दबी ज़ुबान में पार्टी के अंदर प्रशांत किशोर का विरोध करना भी शुरू कर दिया है.

पार्टी के प्रदेश प्रवक्ता नीरज कुमार ने तो बीबीसी से साथ बातचीच में यहां तक कह दिया कि 'प्रशांत किशोर नए-नए राजनीति में आए हैं और आते ही इस तरह की बयानबाज़ी करके राजनीतिक दुर्घटना के शिकार हो गए हैं.'

जदयू के वरिष्ठ नेता आरसीपी सिंह ने शनिवार को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में प्रशांत किशोर के बयान से जुड़े सवाल का जवाब देते हुए नाम लिए बग़ैर कहा, "जिस समय गठबंधन टूटा था, उस समय की पार्टी गतिविधि के बारे में उनको जानकारी नहीं है. एनडीए के साथ जाने के मामले में पूरी पार्टी की सहमति थी. हमारे नेता नीतीश कुमार उस निर्णय के पक्ष में थे."

राजनीतिक जानकार और विश्लेषक इसे अंतर्कलह से जोड़कर देख रहे हैं. जदयू पार्टी के दोफाड़ होने के बात भी सामने आने लगी है.

वरिष्ठ पत्रकार मणिकांत ठाकुर कहते हैं, "जेडीयू में अंतर्कलह को साफ़ देखा जा सकता है. ऐसा नहीं है कि सब लोग प्रशांत किशोर के बयान के विरोध में ही हैं. पार्टी के अंदर भी किशोर के समर्थन में लोग खड़े हैं. लेकिन, जहां तक बात इसके राजनीतिक परिणामों की है तो इसका प्रभाव आने वाले दिनों में बतौर पार्टी जेडीयू पर दिखेगा."

सवाल ये उठता है कि आख़िर ऐसे वक़्त में जब लोकसभा चुनाव में कुछ दिन ही शेष रह गए हैं, भाजपा-जदयू-लोजपा के एनडीए गठबंधन की सीटों और उम्मीदवारों का फ़ैसला होना बाक़ी है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तो पटना में रैली करके एनडीए के चुनावी कैंपेन की शुरुआत भी कर दी है. ऐसे में प्रशांत किशोर के इन बयानों के मायने क्या हैं?

क्या बोले प्रशांत
बीबीसी ने प्रशांत किशोर से इस ताज़ा विवाद पर बात की. अपने बयान पर क़ायम किशोर ने कहा, "मैं अब भी कहता हूं कि नीतीश कुमार के उस निर्णय से असहमत नहीं हूं. मगर मेथड से असहमत हूं. निर्णय को सही और ग़लत कहा जा सकता है. ये उससे तय होगा कि आप किस नज़रिए से सोचते हैं."

किशोर आगे कहते हैं , "जहां तक नज़रिए की बात है तो मेरा नज़रिया ये है कि बतौर राजनेता नीतीश कुमार ने जनता के बीच काफ़ी उच्च मानदंड स्थापित किया है. नीतीश कुमार वो नेता हैं कि जिन्होंने 2014 में लोकसभा चुनाव में मिली पार्टी के हार की ज़िम्मेदारी लेते हुए विधानसभा में मेजोरिटी की सरकार होते हुए भी मुख्यमंत्री के पद से इस्तीफ़ा दे दिया था."

मेथड (राजद गठबंधन से अलग होने का फ़ैसला और 24 घंटे के अंदर एनडीए में शामिल होकर सरकार बनाना) के सवाल पर किशोर ने कहा, "अगर आप गांधी और लोहिया को फ़ॉलो करते हैं तो आप ऐसा कैसे कर सकते हैं? क्योंकि गांधी और लोहिया की पॉलिसी रिसॉर्ट, ओवरनाइट चेंज और जोड़-तोड़ कर किसी तरह सरकार बना लेने वाली पॉलिसी तो थी नहीं. मैं तो उस नज़रिए से ही देखता हूं नीतीश कुमार को. वो देश के सबसे प्रभावशाली नेताओं में से एक हैं. देश में हवा के विपरीत खड़े हुए मोदी के ख़िलाफ़. जब लोगों ने मेंडेंट नहीं दिया तो मुख्यमंत्री की कुर्सी छोड़ दी. ये सामान्य राजनेता के लिए एक बड़ी बात है."

जदयू के ही कुछ वरिष्ठ नेता कह रहे हैं कि प्रशांत किशोर की राजनीतिक आयु छोटी है और वह राजनीतिक दुर्घटना के शिकार हो गए हैं. इस बारे में प्रशांत किशोर ने कहा, "वे कहते हैं तो कहें. मैं उन्हें कुछ नहीं कहूंगा. अगर लोग ये कह रहे हैं कि मुझे राजनीति नहीं आती है तो नहीं आती है. इसमे मैं क्या कर सकता हूं?"

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